सरस्वती पूजा पर निबंध हिंदी में – Saraswati Puja Essay in Hindi

saraswati puja par nibandh

सरस्वती विद्या, ज्ञान और कला की देवी है। हम उनसे प्रार्थना करते है कि हमें अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो। इस पर्व को “वसन्तोत्सव”, “वसंतपचंमी”, “श्रीपंचमी” भी कहा जाता है, क्योकि इसी पर्व के साथ वसंत का शुभागमन माना जाता है।

 

लता – वल्लरियो में नई कोपले उगने लगती है। आम्रवाटिकाओं में कोयल की कूक और भ्रमरों के गुंजार से वातावरण विहँस उठता है। माँ शारदा युगल करों से वीणा की मोहक तान छेड़कर अपने आराधकों को जगाने लगती हैं। वीणा की मधुर रागिनी को सुनकर बच्चे पाठशालाओ में एवं छात्र विद्यालयों में धुप-दीप एवं प्रसाद लेकर माँ शारदा के पाद-पधों में शीश नवाकर गा उठते हैं –

वर दे ! वीणावादिनी ! वर दे !

वसंत पंचमी में शताब्दियों से माता सरस्वती की पूजा होती आ रही है। यह एक सांस्कृतिक पर्व हैं। माता सरस्वती ‘सत्यम, शिवम, सुन्दरम, के रूप में संसार में सुख, शान्ति और सौन्दर्य का सृजन करती हैं।

 

मानव ज्ञान प्राप्त कर सकता हैं, तो माँ की अनुकम्पा से ही। यही माँ हमारे अंतरतम के अंधकार को दूर कर वहाँ ज्ञान का दीपक जलाती हैं। माता की कृपा से ही कोई कवि, लेखक, चित्रकार, कथाकार, कलाकार, पंडित, ज्ञानी एवं वक्ता बन जाते हैं। अतः माँ की जिन पर कृपा हुई वे अमरत्व को प्राप्त हुए।

 

इस पर्व को मूल रूप से शिक्षार्थी बड़ी धूम -धाम से मनाते है। ज्ञानपिपासु व्यक्तियों के लिए यह श्रद्धावनत होनेवाला पर्व है। इस अवसर पर पाठशाला, विद्यालय और महाविद्यालय एवं उनके छात्रावास रंग – बिरंगी पताकाओ से सजा दिए जाते है।

 

सभी छात्र धूम धाम से माता सरस्वती की मूर्ति की स्थापना कर पूजा अर्चना करते है। आगे प्रसाद -वितरण का कार्यक्रम चलता है। झुण्ड के झुण्ड बच्चे एक स्थान तक घूम-घूम कर प्रसाद प्राप्त करते है।

 

दूसरे दिन माता सरस्वती की प्रतिमा का विसर्जन निकट की नदी या तालाब में कर दिया जाता है। देवी सरस्वती गाजे-बाजे और पान -प्रसाद पर नहीं, आत्मा की शुद्धता पर रीझती हैं।

 

माता सरस्वती हो -हुल्लर, बेढंगे गीत-नृत्य एवं अबीर-गुलाल मल लेने से कभी प्रसन्न नहीं होती। पवित्र वातावरण में पवित्र भावो के पुष्प लेकर उनकी पूजा का अनुष्ठान ही हमें योग्य पात्र और सफल पुजारी सिद्ध कर सकेगा।

 

जो सतत ज्ञान के पथ पर अग्रसर होते है, वे ही माता सरस्वती के सच्चे पुजारी है। जिनके अन्दर सात्विक ज्ञान की पिपासा ,है जो सदा नये ज्ञान की खोज में लगे रहते है, वे ही माता सरस्वती के वरद-पुत्र है।

 

Final Thoughts – 

 

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