सरहुल पर निबंध – Sarhul Festival Essay in Hindi

पर्व-त्यौहार मनुष्य के जीवन की एकरसता को दूर कर उन्हें नए स्फूर्ति से भर देते हैं। एक ही प्रकार के कार्यों को लगातार करते रहने के कारण जीवन में एकरसता आ जाती है और इससे मनुष्य की शक्ति क्षीण होने लगती है।

 

फल यह होता है कि वह अपने कार्यों के प्रति उदासीन होने लगता है। ऐसे समय में जब पर्व-त्योहार मनाए जाते हैं तो इससे मनुष्य का स्वस्थ्य मनोरंजन होता है।

 

उसकी उदासीनता मिट जाती है और एकरसता को पर्व-त्यौहार समाप्त कर देते हैं। इसके बाद आदमी जब फिर लौटकर अपने कार्य पर आते हैं, तो वह दुगनी शक्ति से अपने कार्यों का संपादन करने लगते हैं।

 

इसीलिए भारत में हर महीने कोई न कोई त्यौहार जरूर मनाया जाता है। इन पर्व-त्योहारों में अधिकांश हंसी-खुशी और प्रसन्नता प्रदान करने वाले होते हैं।

 

सरहुल पर निबंध

 

जिस प्रकार हिंदुओं का होली, मुसलमानों की ईद और ईसाइयों का क्रिसमस हंसी-खुशी और प्रसन्नता का पर्व है, उसी प्रकार “सरहुल” आदिवासियों का हंसी-खुशी और आनंद का पर्व है।

 

सरहुल ‘उराव‘ नामक आदिवासियों का सबसे प्रमुख त्यौहार है। यह पर्व चैत महीने में मनाया जाता है। यह कृषि प्रारंभ करने का पर्व है। इस पर्व की तैयारी महीने भर पहले से ही की जाती है।

 

हर आदिवासी चाहे वह दूर काम करने वाले हो या निकट, इस पर्व के अवसर पर घर अवश्य जाते हैं। देश के कोने-कोने में काम करने वाले आदिवासी भाई समय से पूर्व ही चल कर अपने घर पहुंच जाते हैं।

 

सर्वप्रथम घर, दरवाजे और आस-पड़ोस की सफाई की जाती है और फिर घर की दीवारों को रंग-बिरंगी मिट्टी से लीपा जाता है। इस अवसर पर आदिवासी महिलाएं दीवारों पर पशु-पक्षियों के कलात्मक चित्र बनाकर उसे सजाती है।

 

सजावट में इनकी लोकप्रिय कलात्मकता देखते ही बनती है। सरहुल के लिए सुबह से ही मौज-मस्ती और चहल-पहल प्रारंभ की जाती है। स्नान कर नए कपड़े एवं फूल पत्तों से अपने शरीर को सजाते हैं और स्त्री-पुरुष मिलकर गीत गाते हुए “सरना” की पूजा करने लगते हैं।

 

सरना उस पवित्र कुंज को कहा जाता है जिसमें साल के वृक्ष होते हैं। यह कुंज पूजन-स्थान का काम करता है। सभी ‘सरना’ के पास जमा होते हैं। इसके बाद गांव का पुरोहित जिसे ‘पाहन’ कहा जाता है, आता है।

 

सरना के दौरान “हँड़िया” का अघर्य दिया जाता है। ‘हँड़िया’ आदिवासियों के द्वारा तैयार की गई एक विशेष प्रकार की शराब होती है। इसके बाद लोग लौटकर घर आते हैं और अच्छी-अच्छी चीजें खाने में मग्न हो जाते हैं।

 

खाने-पीने के बाद गांव के युवक और जमा होते हैं और फिर प्रारंभ होता है। उन लोगों का मनोरंजक नृत्य और गायन। सभी युवा और युवतियां कतार बांधकर आवाज पर थिरकते हुए गीत गाते हैं।

 

इस प्रकार हँसी-ख़ुशी उनका यह पर्व ‘सरहुल‘ मनाया जाता है। हर आदिवासी बड़ी ही व्यग्रता से इस पर्व की प्रतीक्षा करते रहते हैं।

 

Final Thoughts – 

 

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