लाल बहादुर शास्त्री पर निबंध – Lal Bahadur Shastri Essay in Hindi

Lal Bahadur Shastri Essay in Hindi

lal bahadur shastri essay in hindi

(1 .) भूमिका :- मेरे सबसे प्रिय नेता लाल बहादुर शास्त्री हैं। क्योंकि मैं समझता हूँ कि वे संसार की उन महान विभूतियों में से एक हैं। जिनकी मानवता की स्थायी देन है।

 

एक समय ऐसा भी आता है जब आकाश सहसा काले बादलों से आच्छादन हो जाता है, चारों ओर अंधकार-ही-अंधकार दिखाई पड़ने लगता है, न कोई राह सूझती है, न कहीं कोई ठिकाना दीखता।

 

निराशा की ऐसी घड़ी में सहसा एक प्रकाश किरण हमें राह दिखाती है। पंडित नेहरू के निधन के समय जिस महान नेता हमारे देश का पथ-प्रदर्शन किया वह और कोई नहीं बल्कि लाल बहादुर शास्त्री जी थे।

 

(2 .) बाल्यावस्था (जीवनी) :- बालक लाल बहादुर का जन्म 2 अक्टूबर, 1904 को बनारस के निकट मुगलसराय नामक स्थान में एक अति साधारण कायस्थ परिवार में हुआ था।

 

उनके पिता शारदा प्रसाद जी एक साधारण शिक्षक थे। डेढ़ वर्ष की अबोध आयु में ही उनके ऊपर से पिता की स्नेहवतसल्य छाया हट गई। इसके पश्चात तो उनकी धर्मपरायण माता जी श्रीमती रामदुलारी देवी का स्नेह-सलिल ही नवजात बिखरे को सींचता रहा।

 

(3 .) राजनीति :- अध्ययन के पश्चात शास्त्री जी सक्रिय राजनीति में कूद पड़े। उन्होंने अपना कार्य क्षेत्र इलाहाबाद चुना। वे इलाहाबाद इंप्रूवमेंट ट्रस्ट के सक्रिय सदस्य रहे।

 

वहाँ की कांग्रेस कमेटी के महासचिव के दायित्वपूर्ण कार्य को वे बड़ी तत्परतापूर्वक करते रहे। 1937 ई. में वे उत्तर प्रदेश की विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। 1941 ई. में वे दूसरी बार जेल गए।

 

(4 .) उनकी महत्ता (देश हित में) :- अब लाल बहादुर जी के जीवन का लाल सितारा चमका। पंडित नेहरू का ध्यान भी इस राष्ट्र भक्त एवं साधना के भागीरथ की ओर गया।

 

उन्होंने शास्त्री जी को दिल्ली बुलाकर कांग्रेस-संगठन का कार्य भार सौंपा। शास्त्री जी बड़ी कुशलता से संगठन कार्य करते रहे। जब 1952 ई. में पंडित नेहरू के नेतृत्व में पहली बार भारतीय गणतंत्र का नवनिर्वाचित मंत्रिमंडल बना, पंडित जी ने शास्त्री जी को रेल तथा परिवहन मंत्री बनाया।

 

शास्त्री जी जानते थे कि जिस गाड़ी में सभी श्रेणियों के डिब्बे रहते हैं, उनमें तृतीय श्रेणी के यात्रियों को कितना कष्ट होता है। सामान्य जनता सुविधा के लिए उन्होंने ‘जनता गाड़ी’ चलाई। इससे उन्होंने सामान्य लोगों का यात्रा कस्ट ही नहीं कम किया।

 

27 मई, 1964 को दो बजे दिन में हमारे बीच से पंडित नेहरु नेहरु उठ गए तो ‘नेहरू के बाद कौन’ की विकट समस्या तत्काल समाधान मांगने लगी किन्तु यह बेचैनी बहुत देर नहीं रही और काँग्रेस दल ने सर्वसम्मति से 9 जून, 1964 को शास्त्रीजी ने ज्योंही शासन भार सँभाला, त्योंही उनका ध्यान देश के चतुर्दिक विकास की ओर उन्मुख हुआ किन्तु सितंबर, 1965 में पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण कर दिया।

 

(5 .) उपसंहार :- शास्त्री जी ने उस समय जय जवान जय किसान का नारा दिया था, वह भारतीय प्रगति का सनातन नारा बन गया है। 1962 ईस्वी में भारत ने चीन युद्ध में जो पराजय झेली थी उस कारण जब प्रधानमंत्री हुए थे, तब भारत का सर झुका हुआ था।

 

उन्हें जो सेना मिली हुई थी, वह भी ग्लानि के भार से दबी जा रही थी। उन्होंने उसी सेना में फिर से संजीवनी फूँकी और उसे चेतनावान किया। शास्त्री जी चाहते थे, भारत और पाकिस्तान दोनों पड़ोसी देश शांति से रहे।

 

इसी शांति की खोज में वे अपने देश से दूर ताशकंद गए और वहाँ 1966 ईस्वी की 11 जनवरी की मध्य रात्रि में सदा के लिए हमें छोड़ कर चले गए।

 

Final Thoughts – 

 

आज के इस आर्टिकल में आपने लाल बहादुर शास्त्री जी पर निबंध (Lal Bahadur Shastri Ji Par Nibandh) पढ़ा। जो की मुझे पूर्ण विस्वास है की आपको आज का यह आर्टिकल जरूर पसंद आया होगा।

 

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