मित्रता पर निबंध हिंदी में | Essay on Friendship in Hindi Language

आज के इस आर्टिकल में हम मित्रता (फ्रेंडशिप) पर हिंदी में निबंध पढ़ेंगे। हर व्यक्ति के जीवन में कोई न कोई मित्र अर्थात दोस्त (Friend) जरूर होता हैं।

आज के इस आर्टिकल में हम यह भी जानेंगे की एक अच्छे मित्र में क्या-क्या गुण पाए जाते है और एक अच्छे और बुरे मित्र को हम आसानी से कैसे पहचान कर सकते हैं।

मित्रता पर निबंध हिंदी में – Mitrata Par Nibandh in Hindi

मनुष्य को जीवन के पथ पर चलने अकेले चलने में बहुत-सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता हैं। हर एक मनुष्य को एक ऐसे व्यक्ति की खोज रहती है जो उसके दुःख-सुख में साथ देने वाला हो,

जिसके सामने वह अपने मन-प्राणों की कोई भी बात को आसानी से प्रस्तुत कर सके, जिस पर अपने विस्वास की दीवार को वह खड़ी कर सके।

अतः मित्र मन का वह प्यास है, जिसके लिए मनुष्य तड़पता रहता है और वह बड़ा भाग्यवान है जिसकी यह प्यास बुझ जाती हैं। इसी बात को कवि ‘दिनकर’ ने कहा है की –

मित्रता बड़ा अनमोल रतन! कब इसे तोल सकता है धन!!

एक सच्चा मित्र दैवी उपहार है, स्वग्रीय वरदान है, भद्र मानस का आनंद और अभिमान हैं। यह विभूति केवल मनुष्यो और देवताओं को ही मिली हैं।

भावनाओं के आदान-प्रदान के लिए साथी की आवश्यकता होती हैं। मित्र के अभाव में मनुष्य कुछ खोया खोया सा अनुभव करता हैं।

किससे अपने सुख-दुःख को कहे ? किसके साथ समय बिताये, विपत्ति के समय किसी सहायता ले? क्यूंकि मित्र की रक्षा, उन्नति, उत्थान सभी कुछ सन्मित्र पर आधारित होते हैं।

एक सच्चा मित्र बिना कुछ कहे-सुने अपने मिठे का सदैव हित-चिंतन किया करता हैं। एक सच्चा मित्र अपने साथी मित्र को हमेशा सन्मार्ग की और चलने की प्रेरणा देता हैं।

जब मनुष्य पर विपत्ति के काले-काले बादल घनीभूत अंधकार के समान जमा हो जाते हैं और चारों दिशाओं में निराशाओं के अंधकार के अलवा और कुछ दिखाई नहीं पड़ता है तब केवल सच्चा मित्र ही एक आशा की किरण के रूप में सामने आता हैं।

वह तन-मन और धन से मित्र की सहायता करता है और विपत्ति के गहन गर्त में डूबते हुए मित्र को निकाल कर बाहर ले जाता है। रहीम कवि ने लिखा हैं –

रहिमन सोई मीत है, भीर परे ठहराय। मथत-मथत माखन रहे, दही मही बिलगाय।

मित्रता होनी चाहिए क्षीर और नीर जैसी। स्वार्थी मित्र सदैव विश्वासघात करता है। उसकी मित्रता सदैव पुष्प और भ्र्मर जैसी होती हैं इस प्रकार का मित्र स्वार्थी होता हैं।

विपत्ति के समय स्वार्थी मित्र कभी काम नहीं आ सकता हैं। जिस प्रकार स्वर्ण (सोना) की पहचान कसौटी पर होती है, उसी प्रकार सच्चे मित्र की परख विपत्ति रूपी कसौटी पर होती हैं।

सच्चा मित्र अपने मित्र के मान को अपना ही मान समझता हैं। इसकी प्रतिष्ठा और ख्याति को अपनी प्रतिष्ठा और ख्याति समझता हैं।

वर्तमान समय में सच्चे मित्र का मिलना सचमुच दुर्लभ-सा हो गया हैं। आज के समय अगर किसी व्यक्ति को सच्चा मित्र मिल गया तो मानों की उसका सम्पूर्ण जीवन सफल हो गया।

Final Thoughts –

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