डॉ राजेंद्र प्रसाद पर निबंध हिंदी में | Dr Rajendra Prasad Essay in Hindi

दोस्तों, आज के इस हिंदी निबंध (Hindi Essay) के आर्टिकल में हम भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद पर हिंदी में निबंध पढ़ेंगे। 

 
इस आर्टिकल में हम डॉ राजेंद्र प्रसाद जी के बारे में पूरी जानकारी लेंगे। जैसे की उनका जन्म कहा हुआ था, उन्होंने अपनी पढाई कहा की और किस प्रकार उन्हें भारत का प्रथम राष्ट्रपति बनने का ग़ौरव प्राप्त हुआ। 
 
 
अब हम आज का यह आर्टिकल Short Essay on Dr Rajendra Prasad in Hindi को शुरू करते हैं। आप इस निबंध को पूरा पढ़िए और आपको यह निबंध कैसा लगा नीचे कमेंट बॉक्स के माध्यम से हमें जरूर बताये। 
 

Dr Rajendra Prasad in Hindi Essay – डॉ राजेंद्र प्रसाद पर निबंध 


भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद का विराट व्यक्तित्व हिमालय-सा ऊँचा तथा ह्रदय सागर-सा गंभीर था। वे एक ही साथ ही योगी, चिंतक, समाजसेवी तथा सच्चे देशभक्त थे। 

 
वे सरलता, निष्कपटता तथा सज्जनता की प्रतिमूर्ति थे। राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च महिमा-मंडित पद को सुशोभित करते हुए भी वे राष्ट्रपति-भवन की विलासिता से सदा दूर रहे। 
 
वे भारतीयता के सच्चे प्रतीक थे। मानवता के सम्पूर्ण गुणों से विभूषित ऐसा जनप्रिय नेता किसके न गले का कंठहार होगा ?
 
इनका जन्म 1884 ई. में बिहार राज्य के वर्तमान सिवान जिले के जीरादेई ग्राम में हुआ था। इनकी प्रारंभिक उर्दू के माध्यम से पारंभ हुई थी। कलकत्ते में उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की। 
 
ये प्रखर बुद्धि के थे। हाई स्कूल से एम.ए. तक की सभी परीक्षाएँ में उन्होंने प्रथम श्रेणी में पास की थी। एल-एल. बी. और एल-एल एम. परीक्षाओं में भी वे सर्वप्रथम ही रहे। 
 
अध्ययन के पस्चात उन्होंने वकालत प्रारम्भ की और अपनी अनवरत साधना, कुशाग्र बुद्धि, कर्मठता और लगन के बल पर इनकी गणना उच्च कोटि के वकीलों में की जाने लगी। 
 
देश की परतरंता को देखकर इनका मन चीत्कार कर उठा। देश की पुकार पर उन्होंने अपनी चलती वकालत को तिलांजलि दे दी और गाँधी जी के असहयोग आंदोलन में सम्मिलित हो गए। 
 
बिहार के चम्पारण किसान आंदोलन में उन्होंने बड़ी निष्ठा से कार्य किया। मुंगेर के भूकंप पीड़ित लोगों की सेवा भी उन्होंने काफी लगन तथा धैर्य के साथ की। 
 
धीरे-धीरे देश के बड़े-बड़े नेताओं में इनकी गिनती होने लगी। स्वतंत्रता-सेनानी के रूप में कई बार इन्हें जेल की कठोर यातनाएँ भी सहनी पड़ी। 
 
गाँधी जी के ही आदर्शो पर वे हमेशा चलते रहे। ये अनेक बार अखिल भारतीय कांग्रेस के सभापति भी रहे। 

26 जनवरी, 1950 ई. से भारत एक गणतंत्र राज्य घोषित किया गया। 

तथा राजेंद्र बाबू गणतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति निर्वाचित  हुए। दूसरी बार पुनः ये भारत के राष्ट्रपति चुने गए। इनके ह्रदय में देश-प्रेम की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी। 
 
इसका पता हमें इनके इस कथन से चलता है – “अहिंसा हो या हिंसा, चीनी आक्रमण का सामना हमें करना हैं।” 
 
अंतिम दिनों में वे पटना स्थित सदाकत आश्रम में रहे। 28 फरवरी, 1963 ई. को वे इस धराधाम को सदा के लिए छोड़ कर चले गए। 
 
अब वे हमारे बीच नहीं हैं। किन्तु उनका आदर्श जीवन, सादगी, त्याग, सेवा-भावना और कर्त्तव्यनिष्ठा सदा हमारे लिए पथप्रदर्शक तथा अनुकरणीय रहेंगे। 
 
Final Thoughts – 
 
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